Blessings of Mother

लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई और हंसी-मजाक में लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की माताजी कुछ पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गईं....!
उनकी कमर झुकी हुई थी,. चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी... आंखें भीतर को धंसी हुई किन्तु सजल थीं... उनको देखकर मन मे न जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया......
"माताजी लस्सी पियोगी ?"
मेरी इस बात पर वो माताजी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक... क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 5 या 10 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 35 रुपए की एक है... इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उस बूढ़ी माताजी के द्वारा मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी!
ऊन माताजी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 8-10 रुपए थे वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए... मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा...
"ये किस लिए?"
"इनको मिलाकर मेरी लस्सी के पैसे चुका देना बाबूजी !"
भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था... रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी!
एकाएक मेरी आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा... उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गईं...
अब मुझे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने दोस्तों और कई अन्य ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह सका!
डर था कि कहीं कोई टोक ना दे.....कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बिठाए जाने पर आपत्ति न हो जाये... लेकिन वो कुर्सी जिसपर मैं बैठा था मुझे काट रही थी......
लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम सब मित्रों और बूढ़ी माताजी के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर माताजी के पास ही जमीन पर बैठ गया क्योंकि ऐसा करने के लिए तो मैं # स्वतंत्र था... इससे किसी को # आपत्ति नही हो सकती थी... हां! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा... लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर ऊन माताजी को उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा.......
"ऊपर बैठ जाइए साहब! मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं किन्तु इंसान कभी-कभार ही आता है"
अब सबके हाथों मे लस्सी के कुल्लड़ और होठों पर सहज मुस्कुराहट थी, बस एक वो माताजी ही थीं जिनकी आंखों मे तृप्ति के आंसूं... होंठों पर मलाई के कुछ अंश और दिल में सैकड़ों दुआएं थीं!

Woman has enormous energy

शीर्षक: ये औरतें भी न!

अरे यार! ये औरतें भी न,
बड़ी बेवकूफ होती हैं।
दो मिनट की आरामदायक और
बच्चों के पसंद की ज़ायकेदार मैगी को छोड़,
किचन में गर्मी में तप कर
हरी सब्ज़ियाँ बनाती फिरती हैं।
बच्चे मुँह बिचकाकर
नाराज़गी दिखलाते हैं सो अलग,
फिर भी बाज नहीं आती।

अरे यार! ये औरतें भी न,
बड़ी बेवकूफ होती हैं।
जब किसी बात पे दिल दुखे ,
तो घर मे अकेले में आँसुओं
की झड़ी लगा देगी।
लेकिन बाहर अपनी सहेलियों के
सामने तो ऐसे मुस्कुरायेगी,
जैसे उसके जितना
सुखी कोई नहीं।

अरे यार! ये औरतें भी न,
बड़ी बेवकूफ़ होती हैं।
जब कभी लड़ लेगी पति से,
तो सोच लेगी अब मुझे
तुमसे कोई मतलब नहीं।
लेकिन शाम में जब घर आने में
पति महाशय को देर हो जाये,
तो घड़ी पे टक-टकी
लगाए रहेगी।
और बच्चों से बोलेगी,
"फोन कर के पापा से पूछो
आये क्यों नहीं अभी तक?"

अरे यार! ये औरतें भी न,
बड़ी बेवकूफ होती हैं।
तिनका तिनका जोड़कर
अपने आशियाने को बनाती
और सजाती हैं,
चलती और ढलती रहती
है सबके अनुसार।
लेकिन कभी एक कदम भी
बढ़ा ले अपने अनुसार,
तो "यहाँ ऐसे नहीं चलेगा
जाओ अपने घर (मायका)
ये सब वहीं करना।"
सुन रो रोकर
सोचती रहती है,
अब मैं इस घर में नहीं रहूँगी।
रात भर आँसुओं से
तकिया गीला कर,
उल्लू की तरह
आँखें सूजा लेती हैं।
अगले दिन फिर से
सुबह उठकर
तैयार करने लगती है,
बच्चों की टिफिन और
सबके के लिए नाश्ता।
बदलने लगती है
ड्राइंग रूम के कुशन कवर,
और फिर से सींचने लगती है
अपने लगाए पौधों को।
सच में एकदम पागल है!
सोचती कुछ है और
करती कुछ!

अरे यार! ये औरतें भी न,
बड़ी बेवकूफ होती हैं....

Temple visit is scientific

*इन कारणों से मंदिर जाना स्वास्थ्य के लिए होता है अच्छा*

आमतौर पर मंदिर में जाना धर्मिक से जोड़ा जाता है। लेकिन मंदिर जाने के कुछ साइंटिफिक हेल्थ बेनिफिट्स भी हैं। अगर हम रोज मंदिर जाते हैं तो इससे कई तरह की हेल्थ प्रॉब्लम्स कंट्रोल की जा सकती हैं। यहां जानिए ऐसे 7 फायदे जो हमें रोज मंदिर जाने से मिलते हैं।

*हाई BP कंट्रोल करने के लिए*
मंदिर के अंदर नंगे पैर जाने से यहां की पॉजिटिव एनर्जी पैरों के जरिए हमारी बॉडी में प्रवेश करती है। नंगे पैर चलने के कारण पैरों में मौजूद प्रेशर प्वाइंट्स पर दवाब भी पड़ता है, जिससे हाई BP की प्रॉब्लम कंट्रोल होती है।

*कॉन्सेंट्रेशन बढ़ाने के लिए*
रोज़ मंदिर जाने और भौहों के बीच माथे पर तिलक लगाने से हमारे ब्रेन के ख़ास हिस्से पर दवाब पड़ता है। इससे कॉन्सेंट्रेशन बढ़ता है।

*एनर्जी लेवल बढ़ाने के लिए*
रिसर्च कहती है, जब हम मंदिर का घंटा बजाते हैं, तो 7 सेकण्ड्स तक हमारे कानों में उसकी आवाज़ गूंजती है। इस दौरान बॉडी में सुकून पहुंचाने वाले 7 प्वाइंट्स एक्टिव हो जाते हैं। इससे एनर्जी लेवल बढ़ाने में हेल्प मिलती है।

*इम्युनिटी बढ़ाने के लिए*
मंदिर में दोनों हाथ जोड़कर पूजा करने से हथेलियों और उंगलियों के उन प्वॉइंटस पर दवाब बढ़ता है, जो बॉडी के कई पार्ट्स से जुड़े होते हैं। इससे बॉडी फंक्शन सुधरते हैं और इम्युनिटी बढ़ती है।

*बैक्टीरिया से बचाव के लिए*
मंदिर में मौजूद कपूर और हवन का धुआं बैक्टीरिया ख़त्म करता है। इससे वायरल इंफेक्शन का खतरा टलता है।

*स्ट्रेस दूर करने के लिए*
मंदिर का शांत माहौल और शंख की आवाज़ मेंटली रिलैक्स करती है। इससे स्ट्रेस दूर होता है।

*डिप्रेशन दूर होता है*
रोज़ मंदिर जाने और भगवान की आरती गाने से ब्रेन फंक्शन सुधरते हैं। इससे डिप्रेशन दूर होता हैं।।
🙏🏻🌹जय श्री राम🌹🙏🏻

Hardships of life

*((नानक दुखिया सब संसार))*
*एक दिन एक छोटी सी लड़की अपने पिता को दुख व्यक्त करते-करते अपने जीवन को कोसते हुए यह बता रही थी कि उसका जीवन बहुत ही मुश्किल दौर से गुज़र रहा है।साथ ही उसके जीवन में एक दुख जाता है तो दूसरा चला आता है और वह इन मुश्किलों से लड़ लड़ कर अब थक चुकी है।वह करे तो क्या करे।उसके पिता प्रोफेशन से एक खानसामे (Chef) थे।अपनी बेटी के इन शब्दों को सुनने के बाद वह अपनी बेटी को रसोईघर ले गये और 3 अलग अलग कढाई में पानी डाल कर तेज आग पर रख दिया।जैसे ही पानी गरम हो कर उबलने लगा,पिता नें एक कढाई में एक आलू डाला,दुसरे में एक अंडा और तीसरी कड़ाई में कुछ कॉफ़ी बीन्स डाल दिए।वह लड़की बिना कोई प्रश्न किये अपने पिता के इस काम को ध्यान से देख रही थी।कुछ 15-20 मिनट के बाद उन्होंने आग बंद कर दिया और एक कटोरे में आलू को रखा,दुसरे में अंडे को और कॉफ़ी बीन्स वाले पानी को कप में।पिता ने बेटी की तरफ उन तीनों कटोरों को एक साथ दिखाते हुए बेटी से कहा कि पास से देखो इन तीनों चीजों को–बेटी ने आलू को देखा जो उबलने के कारण मुलायम हो गया था।उसके बाद अंडा को देखा जो उबलने के बाद अन्दर से थोड़ा कठोर हो गया था और आखरी में जब कॉफ़ी बीन्स को देखा तो उस पानी से बहुत ही अच्छी खुशबु आ रही थी।पिता ने बेटी से पुछा ?क्या तुमको पता चला इसका मतलब क्या है ?तब उसके पिता ने समझाते हुए कहा इन तीनों चीजों ने जो मुश्किल झेली वह एक समान थी लेकिन तीनों के रिएक्शन अलग अलग हैं।हमारी ज़िन्दगी भी ऐसी ही है कष्ट और मुसीबतें हम सबको आती हैं लेकिन इन दुखों और कष्टों को सहने का रिएक्शन हम सबका अलग अलग होता है।कोई दुःख और तकलीफ देखकर इतना हताश और मायूस होकर इस उबले आलू की तरह नरम हो जाता है और अपने दुःखों और मुसीबतों का ढिंढोरा पीटना शुरू कर देता है।दूसरे वो होते हैं जो दुःख और मुसीबतों को भले ही किसी को नहीं बतायें लेकिन अंदर से इतने टूट जाते है जैसे उबले अंडे का हाल होता है।और तीसरे वो होते हैं जो दुखों और मुसीबतों से ना तो बाहर से घबराते हैं और ना ही अंदर से टूट कर उदास होते हैं। बल्कि ऐसे लोग दुखों और मुसीबतों को मालिक की मौज समझ कर बड़ी ख़ुशी से स्वीकार करते हैं।और ऐसे लोग मालिक से अपने दुःख की शिकायत नहीं करते बल्कि इन्हें सहने की शक्ति मांगते है।और ऐसे लोग ही दुःख और मुसीबतों में मुस्कुरा कर दूसरों के लिए सबक और मिसाल बन कर कॉफी बीन्स की तरह खुशबू फैलाते रहते हैं।इस कहानी से सीख लेते  हुए हमें भी दुख और  मुसीबत में ईश्वर को  कोसना नहीं चाहिए बल्कि उस की रज़ा में राज़ी रह कर दुख की घड़ी में भी मुस्करा कर उस का सामना करना चाहिए और हर पल  ईश्वर का शुकराना करना  चाहिए !!

Great Support for Failure

*बगैर बाहें फैलाए एक आलिंगन !*

दसवीं क्लास में जब मैं पहली बार फेल हुआ, कितना डरा-सहमा, शर्म और ग्लानि से भरा घर पहुँचा था, सिर्फ़ और सिर्फ़ मैं जानता हूँ।

साल 1986 में जब 10 प्लस 2 पाठ्यक्रम लागू हुआ, मेरी पहली ही बैच थी। किसी को कुछ समझ न आया। सरकारी स्कूलों के 'बेचारे' शिक्षक नए कोर्स की ट्रेनिंग लेते रहे और साल गुजर गया। परीक्षा की घड़ी आ गई। सारे सहपाठियों की तरह मुझ पर भी 'एक्ज़ाम फोबिया' था। डर में न पढ़ाई हुई न परचे अच्छे गए।

जब नतीजे का दिन आया, पिता को पूर्वानुमान था इसलिए बड़ा भाई साथ स्कूल भेजा गया। मार्कशीट मिली तो 6 में से दो विषय गणित और अंग्रेजी में फेल था। इतने कम नम्बर थे कि सरकार के तय किए 30 नम्बर के 'ग्रेस मार्क्स' भी कम पड़ गए। एकमात्र 'सुकून' था तो ये कि सारे दोस्त फेल थे।

पिता की अदालत में अपने बचाव के लिए मेरे पास 'तर्क का तिनका' बस इतना था कि सारे दोस्त फेल हो गए और मैं सप्लीमेंट्री का पात्र तो हूँ!

हाथ में अपनी नाकामयाबी का दस्तावेज थामे ऐसे हज़ार जवाब जिव्हाग्र पर जमाता भाई के साथ घर आया।

माता-पिता तो संतान की सूरत देख पूरा अस्तित्व बाँच लेते हैं, सो मेरे पिता ने भी बाँच ली। न मैं कुछ बोला न वे बोले। मैं बोलने लायक न था, पिता जानते थे वह समय उनके बोलने लायक नहीं है।

जानना चाहेंगे तब मेरे पिता ने क्या किया ? अपनी जेब से पाँच रुपये का नोट निकाला, बड़े भाई को दिया और कहा, 'इसके साथ जाओ और फ़िल्म दिखा लाओ।'

इंदौर के प्रकाश टाकीज में किशोरकुमार की कॉमेडी फिल्म 'प्यार किए जा' देखी गई। एक रुपये 60 पैसे के दो टिकट के बाद बचे एक रुपये 80 पैसे से इंटरवल में पाव के साथ आलूबड़े का भोग लगा। शाम कोई पाँच बजे अन्न का पहला दाना। दिन भर से 'रिज़ल्ट फ़ोबिया' ने भूख के गले पर छुरी जो धर रखी थी!

उसके बाद मैं कभी फेल न हुआ। साल दर साल बेहतर ही हुआ, जितना भी हो सका!

आपका बच्चा जब मायूस मुख घर आता है और कहता है, 'परचा कमजोर गया।' तब उसे कभी मत कहिए कि 'हम तो समझाते ही थे, तुम मस्ती करते रहे, अब भुगतो।'

क्योंकि उस घड़ी उसे आपकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

याद कीजिए जब वह परचा देकर उछलता हुआ घर आया था और तब आपने उसे बाहों में भर लिया था। इसलिए तब भी बाहों में भर लीजिए जब वह बस्ता फेंककर नहीं, रखकर जूते उतार रहा है।

तब उसे आपके आलिंगन की अनिवार्य आवश्यकता है।

शायद उतनी ही जितनी मुझे उस दिन अपने पिता की 'अनपेक्षित प्रतिक्रिया' की थी। एक शब्द न कहकर बहुत कुछ कह दिया था और मैंने सुना ही नहीं, समझ भी लिया था।

बगैर बाहें फैलाए आलिंगन घट गया था!

परीक्षा के दिन हैं। अपने-अपने अंतर में अपने-अपने आलिंगनों की खुशबू सम्भालिए, बहुत बार फैलाना पड़ेगी।

👍🏻🙏🏻👍🏻
A great message for all parents👍🙏👍

Greatness of GURUJI

💐✍💐

*गुरु क्या है..*

१) गुरु हर सवाल का जवाब है
२) गुरु हर मुश्किल की युक्ति है
३) गुरु ज्ञान का भंडार है
४) गुरु मार्गदर्शक है
5) गुरु एक अहसास है
६) गुर प्यार है
७) गुरु ज्ञान की वाणी है
८) गुरु हमारे जीवन का चमत्कार है
९) गुरु मित्र है
१०) गुरु भगवान् रूप है
११) गुरु अध्यात्म की परिभाषा है

धन्य हे वो लोग जो गुरु के संपर्क मे है तथा उनके सानिध्य में जीवन के कुछ ज्ञान और शिक्षा ग्रहण करने का अवसर मिला।
गुरु शब्द और गुरु का जीवन समुंदर की गहराई है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है।
 
*सब धरती कागज करूँ लिखनी सब वनराय*
*सात सुमुंदर को मसि करूँ गुरु गुण लिखा ना जाये*

*गुरु की महत्ता*

करता  करे ना कर सके , गुरु करे सब होय |
*सात द्वीप नौ खंड में गुरु से बड़ा ना कोय ||*
मैं तो सात संमुद्र की मसीह करु , लेखनी सब बदराय |
*सब धरती कागज करु पर , गुरु गुण लिखा ना जाय ।।*

गुरु का हाथ पकड़ने की बजाय अपना हाथ गुरु को पकड़ा दो
क्योंकि हम गुरु का हाथ गलती से छोड़ सकते हैं,  किन्तु........
गुरु हाथ पकड़ेंगे तो कभी नहीं छोड़ेंगे 

गुरु ही ब्रम्हा  गुरु ही विष्णु  गुरु देवो महेश्वरः ।।
*गुरु ही साक्षात परब्रह्म  तस्मै श्री गुरुवै नमः ।।*

गुरु के बिना ज्ञान अधूरा है , गुरु ही हमें सही राह दिखाते है ।
इसलिए हमें गुरु की हर आज्ञा का पालन करना चाहिए ।।
प्रभु श्रीराम एवं श्री कृष्ण को भी गुरु के पास शिक्षा प्राप्त करना पड़ा था ।।
गुरु भक्ति के कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में हैं ।।

            गुरु केवल मार्गदर्शक है।
आत्मा के लिये तो आपको ही पुरुषार्थ करना है।
गुरु ने रास्ता दिखाया है,
चलना आपको है।
गुरु ने उपदेश दीया है,
पालन आपको करना है।
गुरु की वाह वाह से मोक्ष नहीं मिलता है।
गुरुवचन के अनुसार चलने से मोक्ष मिलता है

जब गुरु के दर जाना हो,
तो दिमाग बंद कर लेना.....

जब गुरु के शबद सुनने हों,
तो कान खोल लेना....
जब गुरु पे विश्वास करना हो,
तो आँखें बंद कर लेना....

जब गुरु को अर्पण करना हो,
तो दिल खोल लेना......
जब गुरु का प्रवचन सुनना हो,
तो मुख बंद कर लेना......

जब गुरु की सेवा करनी हो,
तो घड़ी बंद कर लेना.....
जब गुरु से विनती करनी हो,
तो झोली खोल लेना..... !!!!!!

*यह गुरु का दर है भाई यहाँ मनमानी नही होती,*
*यह बातभी पक्की है कि कोई परेशानी नही होती,*

Politeness of devotee

बहुत समय पहले की बात है,
एक कसाई था सदना। वह बहुत ईमानदार था, वो भगवान के नाम कीर्तन में ही मस्त रहता था। यहां तक की मांस को काटते-बेचते हुए भी वह भगवद्नाम गुनगुनाता रहता था।

एक दिन वह अपनी ही धुन में कहीं जा रहा था कि उसके पैर से कोई पत्थर टकराया। वह रूक गया l उसने देखा एक काले रंग के गोल पत्थर से उसका पैर टकरा गया है। उसने वह पत्थर उठा लिया व जेब में रख लिया यह सोच कर कि यह माँस तोलने के काम आयेगा।
वापिस आकर उसने वह पत्थर माँस के वजन को तोलने के काम में लगाया। कुछ ही दिनों में उसने समझ लिया कि यह पत्थर कोई साधारण नहीं है। जितना वजन उसको तोलना होता, पत्थर उतने वजन का ही हो जाता है।
धीरे-धीरे यह बात फैलने लगी कि सदना कसाई के पास वजन करने वाला पत्थर है, वह जितना चाहता है, पत्थर उतना ही तोल देता है। किसी को एक किलो गोश्त देना होता तो तराजू में उस पत्थर को एक तरफ डालने पर, दूसरी ओर एक किलो का मीट ही तुलता। अगर किसी को दो किलो चाहिए हो तो वह पत्थर दो किलो के भार जितना भारी हो जाता।
इस चमत्कार के कारण उसके यहां लोगों की भीड़ जुटने लगी। भीड़ जुटने के साथ ही सदना की दुकान की बिक्री बढ़ गई।
बात एक शुद्ध ब्राह्मण तक भी पहुंची। हालांकि वह ऐसी अशुद्ध जगह पर नहीं जाना चाहता था जहां मांस कटता हो व बिकता हो किन्तु चमत्कारिक पत्थर को देखने की उत्सुकता उसे सदना की दुकान तक खींच लाई l
दूर से खड़ा वह सदना कसाई को मीट तोलते देखने लगा। उसने देखा कि कैसे वह पत्थर हर प्रकार के वजन को बराबर तोल रहा था। ध्यान से देखने पर उसके शरीर के रोंए खड़े हो गए। भीड़ के छटने (जाने के) बाद ब्राह्मण सदना कसाई के पास गया। ब्राह्मण को अपनी दुकान में आया देखकर सदना कसाई प्रसन्न भी हुआ और आश्चर्यचकित भी। बड़ी नम्रता से सदना ने ब्राह्मण को बैठने के लिए स्थान दिया और पूछा कि वह उनकी क्या सेवा कर सकता है?
ब्राह्मण बोला- “तुम्हारे इस चमत्कारिक पत्थर को देखने के लिए ही मैं तुम्हारी दुकान पर आया हूँ, या युँ कहें कि ये चमत्कारी पत्थर ही मुझे खींच कर तुम्हारी दुकान पर ले आया है।“
बातों ही बातों में उन्होंने सदना कसाई को बताया कि जिसे पत्थर समझ कर वो माँस तोल रहा है, वास्तव में वो शालीग्राम जी हैं, जोकि भगवान का स्वरूप होता है। शालीग्राम जी को इस तरह गले-कटे मांस के बीच में रखना व उनसे मांस तोलना बहुत बड़ा पाप है।
सदना बड़ी ही सरल प्रकृति का भक्त था। ब्राह्मण की बात सुनकर उसे लगा कि अनजाने में मैं तो बहुत पाप कर रहा हूं। अनुनय-विनय करके सदना ने वह शालिग्राम उन ब्राह्मण को दे दिया और कहा कि “आप तो ब्राह्मण हैं अत: आप ही इनकी सेवा-परिचर्या करके इन्हें प्रसन्न करें। मेरे योग्य कुछ सेवा हो तो मुझे अवश्य बताएं।“
ब्राह्मण उस शालीग्राम शिला को बहुत सम्मान से घर ले आए। घर आकर उन्होंने श्रीशालीग्राम को स्नान करवाया, पँचामृत से अभिषेक किया व पूजा-अर्चना आरम्भ कर दी।
कुछ दिन ही बीते थे कि उन ब्राह्मण के स्वप्न में श्री शालीग्राम जी आए व कहा - 'हे ब्राह्मण! मैं तुम्हारी सेवाओं से प्रसन्न हूं, किन्तु तुम मुझे उसी कसाई के पास छोड़ आओ।'
स्वप्न में ही ब्राह्मण ने कारण पूछा तो उत्तर मिला कि- “तुम मेरी अर्चना-पूजा करते हो, मुझे अच्छा लगता है परन्तु जो भक्त मेरे नाम का गुणगान - कीर्तन करते रहते हैं उनको मैं अपने-आप को भी बेच देता हूँ। सदना तुम्हारी तरह मेरा अर्चन नहीं करता है परन्तु वह हर समय मेरा नाम गुनगुनाता रहता है जोकि मुझे अच्छा लगता है, इसलिए तो मैं उसके पास गया था। सचमुच मुझे बहुत अच्छा लगेगा अगर तुम मुझे वहीं छोड़ आओ, तो।“
ब्राह्मण अगले दिन ही, सदना कसाई के पास गया व उनको प्रणाम करके, सारी बात बताई व श्रीशालीग्रामजी को उन्हें सौंप दिया। ब्राह्मण की बात सुनकर सदना कसाई की आंखों में आँसू आ गए। मन ही मन उन्होंने माँस बेचने-खरीदने के कार्य को तिलांजली देने की सोची और निश्चय किया कि यदि मेरे ठाकुर को कीर्तन पसन्द है तो मैं अधिक से अधिक समय नाम-कीर्तन ही करूंगा l

जय श्री कृष्णा जी 🙏🙏
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Thankfulness to God

एक भक्त था वह परमात्मा को बहुत मानता था,
बड़े प्रेम और भाव से उनकी सेवा
किया करता था ।

एक दिन भगवान से
कहने लगा –

मैं आपकी इतनी भक्ति करता हूँ पर आज तक मुझे आपकी अनुभूति नहीं हुई ।

मैं चाहता हूँ कि आप भले ही मुझे दर्शन ना दे पर ऐसा कुछ कीजिये की मुझे ये अनुभव हो की आप हो।

भगवान ने कहा ठीक है,
तुम रोज सुबह समुद्र के किनारे सैर पर जाते हो,
जब तुम रेत पर
चलोगे तो तुम्हे दो पैरो की जगह चार पैर दिखाई देंगे ।
दो तुम्हारे पैर होंगे और दो पैरो के निशान मेरे होंगे ।

इस तरह तुम्हे मेरी
अनुभूति होगी ।

अगले दिन वह सैर पर गया,
जब वह रेत पर चलने लगा तो उसे अपने पैरों के साथ-साथ दो पैर और भी दिखाई दिये वह बड़ा खुश हुआ ।

अब रोज ऐसा होने लगा ।

एक बार उसे व्यापार में घाटा हुआ सब कुछ चला गया,
वह रोड़ पर आ गया उसके अपनो ने उसका साथ छोड दिया ।

देखो यही इस दुनिया की प्रॉब्लम है, मुसीबत में सब साथ छोड़ देते है ।

अब वह सैर पर गया तो उसे चार पैरों की जगह दो पैर दिखाई दिये ।

उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि बुरे वक्त में भगवान ने भी साथ छोड दिया।

धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होने लगा फिर सब लोग उसके
पास वापस आने लगे ।

एक दिन जब वह सैर
पर गया तो उसने देखा कि चार पैर वापस दिखाई देने लगे ।

उससे अब रहा नही गया,
वह बोला-

भगवान जब मेरा बुरा वक्त था तो सब ने मेरा साथ छोड़ दिया था पर मुझे इस बात का गम नहीं था क्योकि इस दुनिया में ऐसा ही होता है,
पर आप ने भी उस समय मेरा साथ छोड़ दिया था,
ऐसा क्यों किया?

भगवान ने कहा –

तुमने ये कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारा साथ छोड़ दूँगा,
तुम्हारे बुरे वक्त में जो रेत पर तुमने दो पैर के निशान देखे वे तुम्हारे पैरों के नहीं मेरे पैरों के थे,

उस समय में तुम्हे अपनी गोद में उठाकर चलता था और आज जब तुम्हारा बुरा वक्त खत्म हो गया तो मैंने तुम्हे नीचे उतार दिया है ।

इसलिए तुम्हे फिर से चार पैर दिखाई दे रहे ।

So moral is never loose faith on God. U believe in him, he will look after u forever.

✔जब भी बड़ो के साथ बैठो तो परमात्मा का धन्यवाद , क्योंकि कुछ लोग इन लम्हों को तरसते हैं ।

✔जब भी अपने काम पर जाओ तो परमात्मा का धन्यवाद , क्योंकि बहुत से लोग बेरोजगार हैं ।

✔परमात्मा का धन्यवाद कहो कि तुम तन्दुरुस्त हो , क्योंकि बीमार किसी भी कीमत पर सेहत खरीदने की ख्वाहिश रखते हैं ।

✔ परमात्मा का धन्यवाद कहो कि तुम जिन्दा हो , क्योंकि मरे हुए लोगों से पूछो जिंदगी की कीमत ।

दोस्तों की ख़ुशी के लिए तो कई मैसेज भेजते हैं । देखते हैं परमात्मा के धन्यवाद का ये मैसेज कितने लोग शेयर करते हैं ।
किसी पर कोई दबाव नही है ।

🙏🙏🙏

Preaching to God

संत की वाणी

• किसी नगर में एक बूढ़ा चोर रहता था। सोलह वर्षीय उसका एक लड़का भी था। चोर जब ज्यादा बूढ़ा हो गया तो अपने बेटे को चोरी की विद्या सिखाने लगा। कुछ ही दिनों में वह लड़का चोरी विद्या में प्रवीण हो गया! दोनों बाप बेटा आराम से जीवन व्यतीत करने लगे!

• एक दिन चोर ने अपने बेटे से कहा-- ”देखो बेटा, साधु-संतों की बात कभी नहीं सुननी चाहिए। अगर कहीं कोई महात्मा उपदेश देता हो तो अपने कानों में उंगली डालकर वहां से भाग जाना, समझे!

• ”हां बापू, समझ गया!“ एक दिन लड़के ने सोचा, क्यों न आज राजा के घर पर ही हाथ साफ कर दूं। ऐसा सोचकर उधर ही चल पड़ा। थोड़ी दूर जाने के बाद उसने देखा कि रास्ते में बगल में कुछ लोग एकत्र होकर खड़े हैं। उसने एक आते हुए व्यक्ति से पूछा,-- ”उस स्थान पर इतने लोग क्यों एकत्र हुए हैं?“

• उस आदमी ने उत्तर दिया-- ”वहां एक महात्मा उपदेश दे रहे हैं!“

• यह सुनकर उसका माथा ठनका। ‘इसका उपदेश नहीं सुनूंगा ऐसा सोचकर अपने कानों में उंगली डालकर वह वहां से भाग निकला!

• जैसे ही वह भीड़ के निकट पहुंचा एक पत्थर से ठोकर लगी और वह गिर गया। उस समय महात्मा जी कह रहे थे, ”कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। जिसका नमक खाएं उसका कभी बुरा नहीं सोचना चाहिए। ऐसा करने वाले को भगवान सदा सुखी बनाए रखते हैं!“

• ये दो बातें उसके कान में पड़ीं। वह झटपट उठा और कान बंद कर राजा के महल की ओर चल दिया। वहां पहुंचकर जैसे ही अंदर जाना चाहा कि उसे वहां बैठे पहरेदार ने टोका,-- ”अरे कहां जाते हो? तुम कौन हो?“

• उसे महात्मा का उपदेश याद आया, ‘झूठ नहीं बोलना चाहिए।’ चोर ने सोचा, आज सच ही बोल कर देखें। उसने उत्तर दिया-- ”मैं चोर हूं, चोरी करने जा रहा हूं!“

• ”अच्छा जाओ।“ उसने सोचा राजमहल का नौकर होगा! मजाक कर रहा है। चोर सच बोलकर राजमहल में प्रवेश कर गया। एक कमरे में घुसा। वहां ढेर सारा पैसा तथा जेवर देख उसका मन खुशी से भर गया!

• एक थैले में सब धन भर लिया और दूसरे कमरे में घुसा! वहां रसोई घर था। अनेक प्रकार का भोजन वहां रखा था। वह खाना खाने लगा!

• खाना खाने के बाद वह थैला उठाकर चलने लगा कि तभी फिर महात्मा का उपदेश याद आया, ‘जिसका नमक खाओ, उसका बुरा मत सोचो।’ उसने अपने मन में कहा, ‘खाना खाया उसमें नमक भी था। इसका बुरा नहीं सोचना चाहिए।’ इतना सोचकर, थैला वहीं रख वह वापस चल पड़ा!

• पहरेदार ने फिर पूछा-- ”क्या हुआ, चोरी क्यों नहीं की?“

• देखिए जिसका नमक खाया है, उसका बुरा नहीं सोचना चाहिए। मैंने राजा का नमक खाया है, इसलिए चोरी का माल नहीं लाया। वहीं रसोई घर में छोड़ आया!“ इतना कहकर वह वहां से चल पड़ा!

• उधर रसोइए ने शोर मचाया-- ”पकड़ो, पकड़ों चोर भागा जा रहा है!“ पहरेदार ने चोर को पकड़कर दरबार में उपस्थित किया!

• राजा के पूछने पर उसने बताया कि एक महात्मा के द्धारा दिए गए उपदेश के मुताबिक मैंने पहरेदार के पूछने पर अपने को चोर बताया क्योंकि मैं चोरी करने आया था!

• आपका धन चुराया लेकिन आपका खाना भी खाया, जिसमें नमक मिला था। इसीलिए आपके प्रति बुरा व्यवहार नहीं किया और धन छोड़कर भागा।

• उसके उत्तर पर राजा बहुत खुश हुआ और उसे अपने दरबार में नौकरी दे दी!

• वह दो-चार दिन घर नहीं गया तो उसके बाप को चिंता हुई कि बेटा पकड़ लिया गया- लेकिन चार दिन के बाद लड़का आया तो बाप अचंभित रह गया अपने बेटे को अच्छे वस्त्रों में देखकर!

• लड़का बोला-- ”बापू जी, आप तो कहते थे कि किसी साधु संत की बात मत सुनो! लेकिन मैंने एक महात्मा के दो शब्द सुने और उसी के मुताबिक काम किया तो देखिए सच्चाई का फल!

• सच्चे संत की वाणी में अमृत बरसता है, आवश्यकता आचरण में उतारने की है ....!!🙏🙏✍✍

Devotion feeling is essential for Find God

🌻 *भाव से बड़ा कुछ नही* 🌻

✍ एक करोड़पति बहुत अड़चन में था। करोड़ों का घाटा लगा था, और सारी जीवन की मेहनत डूबने के करीब थी! नौका डगमगा रही थी। कभी मंदिर नहीं गया था, कभी प्रार्थना भी न की थी। फुरसत ही न मिली थी !

पूजा के लिए उसने पुजारी रख छोड़े थे, कई  मंदिर भी बनवाये थे, जहां वे उसके नाम से नियमित पूजा किया करते थे लेकिन आज इस दुःख की घड़ी में कांपते हाथों वह भी मंदिर गया!

सुबह जल्दी गया, ताकि परमात्मा से पहली मुलाकात उसी की हो, पहली प्रार्थना वही कर सके। कोई दूसरा पहले ही मांग कर परमात्मा का मन खराब न कर चुका हो! बोहनी की आदत जो होती है, कमबख्त यहां भी नहीं छूटी....सो अल्ल-सुबह पहुंचा मन्दिर।

लेकिन यह देख कर हैरान हुआ कि गांव का एक भिखारी उससे पहले से ही मन्दिर में मौजूद था। अंधेरा था, वह भी पीछे खड़ा हो गया, कि भिखारी क्या मांग रहा है? धनी आदमी सोचता है, कि मेरे पास तो मुसीबतें हैं; भिखारी के पास क्या मुसीबतें हो सकती हैं? और भिखारी सोचता है, कि मुसीबतें मेरे पास हैं। धनी आदमी के पास क्या मुसीबतें होंगी? एक भिखारी की मुसीबत दूसरे भिखारी के लिए बहुत बड़ी न थी !

उसने सुना, कि भिखारी कह रहा है --हे परमात्मा ! अगर पांच रुपए आज न मिलें तो जीवन नष्ट हो जाएगा। आत्महत्या कर लूंगा। पत्नी बीमार है और दवा के लिए पांच रुपए होना बिलकुल आवश्यक हैं ! मेरा जीवन संकट में है !

अमीर आदमी ने यह सुना और वह भिखारी बंद ही नहीं हो रहा है; कहे जा रहा है और प्रार्थना जारी है ! तो उसने झल्लाकर अपने खीसे से पांच रुपए निकाल कर उस भिखारी को दिए और कहा - जा ये ले जा पांच रुपए, तू ले और जा जल्दी यहां से !

अब वह परमात्मा से मुखतिब हुआ और बोला -- प्रभु, अब आप ध्यान मेरी तरफ दें, इस भिखारी की तो यही आदत है। दरअसल मुझे पांच करोड़ रुपए की जरूरत है !”

भगवान मुस्करा उठे बोले -- एक छोटे भिखारी से तो तूने मुझे छुटकारा दिला दिया, लेकिन तुझसे छुटकारा पाने के लिए तो मुझको तुमसे भी बढा भिखारी ढूंढना पड़ेगा ! तुम सब लोग यहां  कुछ न कुछ मांगने ही आते हो, कभी मेरी जरूरत का भी ख्याल आया है?

धनी आश्चर्यचकित हुआ बोला - प्रभु आपको क्या चाहिए?

*भगवान बोले - प्रेम ! मैं भाव का भूखा हूँ । मुझे निस्वार्थ प्रेम व समर्पित भक्त प्रिय है ! कभी इस भाव से मुझ तक आओ; फिर तुम्हे कुछ मांगने की आवश्यकता ही नही पड़ेगी !!!