Guruji satsang

9th march 2016
जय गुरूजी
गुरूजी की नज़र  लगातार हमारी हरकतों पर रहती है ...हम संगत बड़े मंदिर जाते हैं ..या  कहीं  और सत्संग में जाते हैं ...हमारा ध्यान शबद पर नहीं होता ..हमें ये पता है कि लंगर प्रसाद खाने से सारी  तकलीफों से निजात मिलता है ..तो हम वहां लंगर खाने के लिए ही उतावले रहते हैं ..

लंगर को प्रसाद किसने बनाया ..ये सोचने की भी जरूरत नहीं  समझते  ...मंदिर गए हैं .. किसी भी तरह से  हमें  लंगर मिल जाये ..बस हो गया ..vip बन कर पहले लंगर प्रसाद ले लें ..या फिर पक्तियां तोड़कर और संगत से आगे चले जाएँ ..हम ऐसे उटपटांग हरकत करते ही रहते  हैं  ..

हमारे प्रैक्टिकल गुरूजी ने एक बड़ा ही सटीक उदाहरण   देकर हमें  समझाने की कोशिश की है ...कहीं भी मंदिरों में जहाँ प्रसाद बंटता है ..लोग लाइन में खड़े होकर  किसी  भी तरह से ज्यादा से ज्यादा प्रसाद लेने  चाहते हैं  ..गुरूजी कहते हैं ..कि ये जो हम प्रसाद या फूल या जल इकठ्ठा करके घर ले कर जाते हैं..इनसे कुछ भी नहीं संवरने वाला  है ...यदि प्रसाद को फलना है तो लड्डू के  एक  बूंदी भी ग्रहण करने से हमारा कल्याण हो जायेगा ... यदि  ज्यादा प्रसाद खाने से ही कल्याण होता तो मंदिर के बहार बैठे भिखारियों के पास तो  थैले भर भर कर बूंदी के  लड्डू होते  हैं ..पर इनकी दशा तो वही  रहती है  ..कोई बदलाव नहीं  आता ..
ऐसा इस कारण  है कि  हम अपने कर्म कटवाने पर ध्यान नहीं दते ...जिस स्तिथि में रब ने आज भेजा है ..वो तो कर्म का ही फल है ..अब हम अपने भाव सही नहीं करते ..पूजा करते भी हैं ..तो धुप और फूल को ही महत्व दे कर निकल  जाते  हैं ...जब हम ईश्वर से जुड़ेंगे ...जब हम उनसे अपने कर्मों की माफ़ी मांगेंगे ..जब हम अपने अंदर को तैयार करेंगे ये मानने के लिए की जो ईश्वर ने आज दिया है ..वही  हमारे  लिए सबसे सही है ..और उस फेज को हँसते हँसते निकालने की कोशिश  करेंगे  ..तभी तो ईश्वर हमारे कर्म कटवाना शुरू करेंगे .

हम थोडा सा जुड़ जाते हैं ..और फिर कहते हैं ..कि अब आपने हमारा हाथ पकड़ लिया है ..अब आप ही करो जो  करना है ...गुरूजी ही करेंगे ..जो  करना  है .ये तो  सही  है ..पर हमने सेवा सिमरन और सत्संग करते हुए अपने को इस लायक तो रखना है कि  जो गुरूजी हमारे लिए कर रहे हैं ..उसे हम ग्रहण कर सकें ..हम क्या करते हैं .. जुड़े  ..लेकिन अब फिर से अपनी पुरानी जिन्दगी में लौट गए ..वही समय बर्बादी ...वैसी ही मस्ती ..कहीं भी गुरु का नाम नहीं ..ध्यान नही ...  उसी तरह  धनोर्पार्जन के लिए दूसरों का गला  काटना ..कैसे  कर्म कटवाएँगे गुरूजी हमारा ..हम तो रोज़ नए कर्म बना रहे हैं

गुरूजी  हमें हर हाल में पार उतारने की कोशिश कर रहे हैं ...सभी को कोई न कोई  धागा दे रखा है ..जिससे बंधे  हम  समय निकाल पा  रहे हैं  ...समय ही तो सही तरीके से निकालना है ..गुरूजी हमपर तो काम कर ही रहे हैं ...

किसी  को सजने में ख़ुशी मिलती है ..उसे सजने की ब्लेस्सिंग दे दिया .. किसी को शौपिंग में अच्छा लगता है ..उसे वैसे ही ब्लेस कर दिया .. किसी  को माँ  चाहिए , किसी को पति चाहिए ...किसी को बच्चा चाहिए ..गुरूजी को पता है की हम इंसान किसी न  किसी  जुडाव  के कारण  ही इस जीवन से  बंधे  होते हैं ..गुरूजी हमारे ख़ुशी को देखते हुए कहते हैं ..” जाओ वही करो जिसमें ख़ुशी मिलती है ...” पर हमें अपने भाव तो पवित्र रखने हैं ...

हम क्या करते हैं ..साज़ धज गए और लगे तुलना करने की ये तो हमसे कम और ये तो हमारे सामने टिक ही नही सकता ..हम अपनी ब्लेस्सिंग याद नहीं रखते ..की गुरूजी ने हमें ये दिया तो सामने वाले को भी तो कुछ और दिया होगा ..हमें फूल सजाना अच्छा लगत है ..हमें वो सेवा दे देते हैं ..पर हमारे अंदर सिर्फ सजाने वाली भावना ही नहीं रहती ..हममें  दूसरों को नीचा  दिखाने वाली भावना भी साथ साथ चलती है ..अब ऐसे में  गुरूजी हमसे  परेशां ही तो होते हैं ..हमें जो दिया हम उस  ख़ुशी को क्यूँ  नहीं जी लेते हैं ..हम हर वक़्त इस लिए परेशां रहते हैं की दुसरे को क्या मिल गया ..ये नहीं  सोचते की हम गुरूजी से कितने करीब आये ...हम ये देखते हैं कि दूसरों को गुरूजी ने क्या ब्लेस किया ...

कर्म बनाना बहुत आसान है पर उसे कटवाना बहुत ही मुश्किल ..कहते तो सभी हैं ..कि गुरूजी हमारे कर्म कटवा रहे हैं ..पर अपने कर्म काटने के लिए हमारे साइड से हमने क्या प्रयत्न किया है ..ये नही सोचते ..कोई सेवा दी ..कठिन लगा .. किसी  और के जिम्मे लगा दिया ..अब  गुरूजी ने तो हमें देना चाह था ..हमने लिया ही नहीं ..

सेवा  का मतलब ही हम नहीं समझ पा रहे हैं ..घर में यदि कोई बीमार है तो उसकी तीमारदारी से हमारे कर्म कटवाएँगे ..घर में  गृहस्थी  के काम को निपुणता के  साथ  करवाकर हमारे कर्म कटवाएँगे ..नौकरी  छुड़ाकर  घर बैठाकर कर्म कटवाएँगे ...शादी में लेट हो रही है ..तो हमारे कर्म ही तो कटवा रहे हैं ..पर हम बैचैन लोग ..गुरूजी की मेहर को समझना ही नहीं चाहते ..

मेरे साथ जो सबसे अच्छी  बात हुई ..गुरूजी से जुड़ने के बाद वो  ये समझ का दे देना था ..कि यदि हम गुरूजी के पास हैं और फिर भी  हमारे साथ कोई घटना या दुर्घटना हो रही है ..हमारा कोई  नुकसान  या फ़ायदा हो रहा है ..तो यही सबसे  अच्छी बात हो सकती है इस क्षण में ..इसके अलावा कोई विकल्प हो ही  नहीं सकता ..अच्छा या बुरा ..

कारण तब हम गुरुजी को अपने माँ पिता के  रूप  में देखते हैं ..और  ऐसा  माँ पिता जो सबकुछ करने में सक्षम है ..जब एक साधारण माँ पिता अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए उस समय जो सबसे उतम  कदम होता है वो उठाता है ..तो हमारे परमपिता  गुरूजी ..जो भी देंगे ..वो हमारे लिए सर्वोतम ही तो होगा
यही भाव ने मुझे गुरूजी के हर लीला को स्वीकार करने योग्य बनाया है ..और गुरूजी जब रहस्य खोलते हैं  अपनी लीला का तो ये समझ भी आ जाता है ..कि कितनी बड़ी ब्लेस्सिंग दी उन्होंने ..इस घटना से

हमारे जीवन में रंग रहे और बिना वैराग्य के भी हम शिव तत्व को पा जायें ..ये दे रहे हैं गुरूजी ...हम संगत को ..पर हम छोटी छोटी बातों में उलझकर   अपनी छोटी छोटी  मांग गुरूजी के सामने रखकर अपनी ही ब्लेस्सिंग गवां रहे हैं ..
हम सांसारिक लोग शादी को अपने जीवन में बहुत महत्व देते हैं ...जिनकी शादियाँ नहीं हुई हैं ..वो गुरूजी से बार बार मांग रहे हैं .. कोई भी पिता जब अपने बच्चे  का रिश्ता करता है तो ये ध्यान रखता है कि उसका भविष्य वहां सुरक्षित रहे ..अब गुरूजी को जो दिख रहा है हमारे भविष्य में उसे देखकर यदि वो अभी शादी ब्लेस नहीं कर रहे हैं ..तो हमें ज़िप लगाकर  धैर्य के  साथ  इंतज़ार करना चाहिए ..

क्या होगा यदि शादी के अगले ही दिन हम वापस अपने मायके आ जाये ..हैं  ऐसे संगत  जिनके  साथ  ऐसा हुआ है ..कोई दो माह तो कोई साल भर  बाद  भी अपना गृहस्थ जीवन शुरू नहीं  कर पाया ..कुछ लोग ऐसे भी हैं ..जहाँ पति पत्नी दोनों में  प्यार  है पर वो एक दुसरे से अलग रह रहे हैं ...कैसे ब्लेस करें गुरूजी यदि शादी के बाद  काल  मृत्यु का योग दिख रहा है ..

ऐसा नहीं  है की हम  संगत ये समझते नहीं हैं ..हम सब कुछ जान रहे हैं ..सुन रहे हैं ...पढ़ रहे हैं ..पर हम जो मानते हैं वो  अलग ही है ...हमारी सोच है कि गुरूजी  तो सबकुछ करने में समर्थ हैं ..तो वो पहले हमारे जो बुरे योग हैं उसको खत्म कर दें और अभी का  अभी हमें ब्लेस कर दें ..

ऐसा नहीं  हो सकता है ..हम सभी प्रकृति के नियम से बंधे हैं ..गुरूजी भी हमारे कर्मों को तभी स्वाहा  करते हैं जब हम उसे ख़त्म करने के लिए उपाय करा रहे हैं ...जैसे सदियों से  महा मृत्युंजय मंत्र का जाप  मृत्यु  से लड़ने में सहायक होता  रहा ..उसी तरह गुरूजी ने ये साधारण सा मंत्र दिया हमें ..

किसी अनुष्ठान की जरूरत नही बताया ..हम बस मन में जपें ...मन से जपें..सत्संग में शुद्ध भाव से बैठे ताकि हमारा बुरा वक़्त  कटता जाए ..वो अपने मौजूदगी में हमारे कर्म कटवाते हैं ..लंगर जल प्रसाद सत्संग इत्यादि के द्वारा हमें वहां तक पहुँचाना चाह रहे हैं ..जहाँ जाकर वो कहें ..हाँ अब ठीक है जाओ तुम्हारी ख़ुशी तुम्हे ब्लेस किया ..

हम अपने को वहां तक पहुंचाने दें तब तो वो  शुभ अवसर आएगा ..हम रास्ते में ही घबरा  जाते  हैं ..किसी और का हाथ पकड़कर ऊपर आना चाहते हैं ..ऐसा नहीं हो सकता .. अपनी यात्रा खुद ही काटनी होगी ..

कोई रास्ता  दिखा सकता है .पर अपना समय तो हमें ही positive करना होगा ..गुरूजी तो हैं ही सबके साथ ...चलने के लिए तैयार ..
जय गुरूजी

Goodness brings goodness

*बहुत सुंदर कथा ..*

*एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोज़ाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहाँ से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी..।*

*वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी, जिसे कोई भी ले सकता था..।*

*एक कुबड़ा व्यक्ति रोज़ उस रोटी को ले जाता और बजाय धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बड़बड़ाता- "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा..।"*

*दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा..*

*वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बड़बड़ाता - "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा.।"*

*वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी की-"कितना अजीब व्यक्ति है,एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है, और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है, मतलब क्या है इसका.।"*

*एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली-"मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी।"*

*और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में ज़हर मिला दिया जो वो रोज़ उसके लिए बनाती थी, और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश की, कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली- "हे भगवन, मैं ये क्या करने जा रही थी.?" और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दिया..। एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी..।*

*हर रोज़ कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी ले के: "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा" बड़बड़ाता हुआ चला गया..।*

*इस बात से बिलकुल बेख़बर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है..।*

*हर रोज़ जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी, जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था..। महीनों से उसकी कोई ख़बर नहीं थी..।*

*ठीक उसी शाम को उसके दरवाज़े पर एक दस्तक होती है.. वह दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है.. अपने बेटे को अपने सामने खड़ा देखती है..।*

*वह पतला और दुबला हो गया था.. उसके कपडे फटे हुए थे और वह भूखा भी था, भूख से वह कमज़ोर हो गया था..।*

*जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा, उसने कहा- "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ.. आज जब मैं घर से एक मील दूर था, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर गया.. मैं मर गया होता..।*

*लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था.. उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया.. भूख के मरे मेरे प्राण निकल रहे थे.. मैंने उससे खाने को कुछ माँगा.. उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि- "मैं हर रोज़ यही खाता हूँ, लेकिन आज मुझसे ज़्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है.. सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो.।"*

*जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी, माँ का चेहरा पीला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाज़े का सहारा लीया..।*

*उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था, अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत..?*

*और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चूका था-*
*जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा,और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा।।*

              *" निष्कर्ष "*
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*हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आप को कभी मत रोको, फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या ना हो..।*
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मैं आपसे दावे के साथ कह सकता हूँ कि ये बहुत से लोगों के जीवन को छुएगी व बदलेगी.
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