Guru ji satsang

Post on 14th jan 2018
जय गुरूजी
गुरूजी के दर  पर आने वाले अधिकांश वही होते हैं जिन्हें कभी न कभी  जिन्दगी ने बुरी तरह निचोड़ा है ...कुछ ऐसे भी दीखते हैं जो शुरु से  ही अपने अध्यात्म प्रगति के लिए जुड़े हों ..पर यकीन माने इन बन्दों ने अपने कष्ट काटने का समय या कहें तो कर्म कटवाना अपने  पिछले जीवन में कर लिए है ..जो थोडा बहुत शेष रह गया ,..उम्र कम पड गयी या कर्म ज्यादा रह गये तो इस जीवन में गुरूजी के पास आकार उसका खात्मा करना है ..
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आज पठानकोट की संगत के साथ लगा कि  बड़े मंदिर में आ गए हों ,खचाखच भरा हाल पर गजब की शांति ,सभी जैसे गुरूजी से  जुड़े हुए हों .. गुरूजी आये  भी और अपने आने का  जैसे एलान  भी कर दिया ... खास बात ,जो यहाँ के संगत में  झलकती है वो है इनकी प्यूरिटी स्तर ,गरूजी ने ऐसे संगतों के साथ रखा है जो वहां सिर्फ गुरु के लिए आते हैं  , न तो  पहनने ओढने में दिखावा ,न ही लंगर या सजावट में दिखावा .. कई बार लगता है कि इंदौर संगत के साथ ही बैठी हुई हूँ ..

यहाँ होने वाले संत्संग से कुछ बातें सीखीं हैं जो सभी जगह के संगत अपना सकते हैं ..  यहाँ किसी के घर में सत्संग  हो ,सजावट अपने घर का और नाममात्र का होता है..जिसे देखकर कोई भी संगत  गुरूजी का आसन और दरबार लगाने की हिम्मत कर सकता है ..इंदौर में भी एक - दो  सत्संग को छोड़ दें  तो सजावट बड़ा ही साधारण होता है ..पर उसमें पोसितिविटी  और खूबसूरती गुरूजी  डाल देते हैं .

लंगर का मेनू बड़ा ही साधारण  रहता है ,संगत को ग्लास में पानी दिया जाता है ..अभी जैसे जाड़े में हल्का गर्म पानी  तो गर्मी में ठंढा पानी देना आसान हो जाता है ..हम आज तक बोतल देते आये  हैं ,जो साधारण आमदनी वाले परिवारों के लिए खर्चीला पड़ सकता है ..किसी  एक संगत के पास यदि 15  कारपेट हैं, तो  हर संगत अपने घर के  सत्संग के लिए उसे  ले जा सकता है ..जिससे उसे गद्दी और चादरों को  बार- बार किराया पर न लाना पड़े
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सत्संग  के बाद लंगर प्रसाद, जहाँ लोग बैठे हैं, उन्ही के बीच छोटी या लम्बी प्लास्टिक , जो आमतौर पर हम डाइनिंग टेबल पर बिछाया करते हैं ,बिछा  दिया जाता है  और सभी लंगर उस पर ही रखकर खाते हैं ,जिससे गंदगी  भी नहीं  फैलती और सभी सही तरीके से लंगर कर पाते हैं ..
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जैसा कि हम अभी तक करते आए हैं कि संगत को हाथ में लंगर दें ..इसमें कई  बार संगत के पास प्लेट को रखने की जगह नहीं होती ,और  लंगर खाना  असुविधाजनक  लगता है ,

सबसे ज्यादा परेशानी आरती के वक़्त महसूस हुआ करती  है, ख़ास कर जब संगत ज्यादा संख्या में हो ....यहाँ मैंने पाया कि ऐसे  में दो  आरती की थाली साथ -साथ चलती है .आरती  का लम्बा वाला ऑडियो लगा दिया जाता है जिससे कि  सभी  आरती  प्यार से कर पायें  ..सबसे खास बात जो महसूस की, वो है संगत को परिवार  समझने वाले फीलिंस ..
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पुरे संगत परिवार से हर उस संगत  के लिए प्रार्थना करने कहा जाता है  जो कैसा  भी  मुसीबत का सामना कर रहा है या करने वाला है ..संगत वही  नहीं, अपने -अपने घरों में जाकर भी गुरूजी से अरदास करती है ..जिससे उन संगत का कल्याण गुरूजी करें ...कोई चोला जरूरी नहीं ,कोई चमकते कपडे जरूरी  नहीं ..जैसी श्रधा, गुरूजी को वैसे बिठाया .बस अपनी भक्ति और सेवा साथ में लिए रहे .
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इन सब बातों का यहाँ लिखने का मतलब ये नहीं है कि यहाँ दुनिया के सबसे अच्छे सत्संग  और बाकि जगह कम अच्छे  सत्संग हो रहे हैं .. गुरूजी ने कोई नियम -कानून नहीं बनाया  कि उनसे कैसे अरदास करें हम ,कैसे  सत्संग करें ,कैसे जुड़ें ..... हम हर वो चीज़ अपना सकते हैं जिससे संगत  को जुड़ने में आसानी लगे ..संगत सत्संग  करा सके ..
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संगत को लचीला रहना  है .. अपने  परिवेश  में ,जब जो , ज्यादा अच्छा लगे, उसे अपनाना चाहिए  हमें ..आज तक पंडितों के बताये सभी काम करते आये ,ईश्वर को कहाँ पा सके ...आज गुरूजी ने जब हमें  उस  रस्ते डाल दिया है कि हमारी  कोई अध्यात्मिक  सीमा ही नहीं है ..जहाँ तक चाहें जा सकते हैं ..भक्ति ,सेवा और प्यार के सहारे ..
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बहुत बार हम गुरुजी के मेसेज देते हैं ..कि गुरूजी ने कहा है ,आधे घंटे मन्त्र जाप कराएँ सत्संग  में ..जब अपना सत्संग  होता है, तो हम खुद नहीं करते .. हमारे मेसेज हमारे लिए भी है  ..पहले खुद उदाहरण रखें ,सबके सामने ,फिर दूसरों से उम्मीद करें ..ऐसा  ही हम तब करते हैं जब अपने घर सत्संग  होता है और हम 2 घंटे का सबद -वाणी रख लेते है ,उसके  बाद मन्त्र  जाप और आरती ,..फिर सत्संग  और बाद में लंगर ..

हमारी उम्मीद रहती  है कि दुसरे जब सत्संग करें तो दो घंटे में सब कुछ खत्म हो जाना चाहिए ,...जिससे की सभी को अपने दुनियादारी  के  कामों के लिए परेशां न होना पड़े , हम जो भी उम्मीद करें ओरों से, ,,पहले उसे  अपने पर लागू करें ..
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बड़े मंदिर में तो करोड़ों खर्च  हो जाते हैं, फूलों की सजावट पर, जो किस भी सूरत में सही  नहीं ठहराया जा सकता है  ..हम क्या भोले नाथ को सजायेंगे ..ये मंदिर तो ऐसे ही इतना ख़ूबसूरत है, जिसकी चर्चा सारे विश्व भर में है ..ये बड़ा नहीं है ,या आलीशान नक्काशी  या कुछ और किया हुआ नहीं है ,पर यहाँ  के हर कण में सुन्दरता  भर  दी है गुरूजी ने ..उच्च उर्जा को अपने में समाये ,हर आगंतुक को , शुकून और शांति देने वाला ,ये दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग का मन्दिर है ,कहीं भी बैठ जाएँ ,हर जगह गुरूजी हैं ,इस मन्दिर के सजावट पर न खर्च कर, गुरूजी ने अपने जरूरतमंद  मंद बन्दों पर खर्च करने कहा है .
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हम ये कर नहीं सकते हैं ..जो मध्यम परिवार से हैं, वो कुछ ऐसा सोच भी लें ,अमीरों की सोच वहां तक जाती ही नहीं है ..वो अपने घर में होने वाले  सत्संग के सजावट पर भी ,लाखों खर्च कर डालते हैं ..उन्हें इसकी थाह ही नहीं है कि इन लाख रूपये से वो कितनो की  मदद कर सकते थे ..पता नहीं कितने कर्म कट जाते ..पर सोच वैसी नहीं है ..गुरूजी के नाम पर तो हज़ारों तरीके से खर्च कर देंगे ..पर कोई जरूरतमन्द मांग ले तो उस  अमीरी में भी अपने तंगी  का रोना रोते नहीं थकते .
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सभी अमीरों को शायद पता नहीं  है कि आज जो पैसा या धन उन्हें मिला  है, वो उनके  पिछले बहुत अच्छे कर्मों के कारण है ..विधाता धन देता है ,सेवा  में लगाने के लिए ..इसकी मदद  से अपने सारे कर्म कटवा सकते हैं ..यदि हमने धन का सेवा में  इस्तेमाल नहीं किया तो हम अपने पिछले  जन्म की कमाई तो खो  ही दे रहे हैं ..इस जन्म के कर्म भी बना ले रहे  हैं .....हर बन्दे के धन का कोटा है ..इस सीमा के बाद उसे और धन नहीं मिल सकता ..

हम कहाँ जानते हैं कि हमारे धन की क्या सीमा है ..अत: जब जितना हमारे पास है उसी से सेवा और दान –पूण्य  या जरूरतमंद बन्दों की मदद कर  लें और कर्म कटवा  लें ,इस बात को समझ कर यदि एक  भी अमीर संगत , अपने विचार में बदलाव लाती है,तो  ये मेसेज देना सफल रहेगा
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एक बार ,एक संगत का ,मुझ तक मेसेज आया कि मेरे  घर के  सत्संग में तो हम आधे घंटे तक ऊँचे आवाज़ में जाप करते हैं ,पर जहां  से मेसेज आया वहाँ  संगत  मन ही मन,पर ऑडियो के  साथ  आधे घंटे का जप करती है ..हम इन्ही छोटी - छोटी  बातों  में फंसे  रहते हैं ..और  कभी -कभी दिल से ले लेते हैं कि मेसेज को ठीक से फॉलो नहीं कर रहे हैं   ..
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जब कोई छोटा ग्रुप हो जो बार -बार नियमित रूप से. आकार जाप कर रहा हो ,उसके साथ मौन  जाप संभव है, क्यूंकि  उनका कनेक्शन लगा हुआ है ..पर जहाँ सत्संग  में आम संगत आ  रही है, कोई नया तो कोई थोडा  पुराना ..जिन्होंने अभी गुरूजी के स्वरुप को निहारना शुरु ही किया है ,वो आँख बंद कर मौन  जाप करते हुए, कैसे कनेक्ट हो पाएंगे ..
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जब ऊँचे आवाज़ में जाप  होता है ,तो ध्वनी और प्रतिध्वनी सभी में से मन्त्र जाप  ही आ रहे होते हैं, जिससे हम चाहे  न चाहे किसी  भी क्षण  जुड़ सकते हैं और ऐसा प्रैक्टिकल कराकर गुरूजी ने इंदौर में दिखाया हुआ है .
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जाप दोनों तरीके का सही है ,संगत किस तरीके से ज्यादा जुड़ सकती है ,हमारे लिए वही बेस्ट तरीका होगा ..मकसद साफ़ है ..मंजिल पता है, फिर कोई दुविधा ही कहाँ है ..जो चीज़ ,जो बातें ,हमने गुरूजी से  जोड़  दे, वही सबसे अच्छी है ..कहीं यदि हमसे गलती हो जाये तो गुरूजी हैं न समझा कर प्यार से वापस ले आते हैं
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ऐसा  ही कुछ गुरूजी के चरणों को रखने को लेकर है ..पहले मेरा मन भी बड़ा उलझन में रहता था ..जो भी संगत आया, कुछ बता कर चला  गया ,,ये करना चाहिए या ये नहीं करना चाहिए ..अब जाकर समझ आया कि हम प्यार से जो भी करेंगे गुरूजी को सब कुछ स्वीकार  है ,,बस उसमें भक्ति ,श्रधा और प्यार हो  ,ये अहम भाव या नकल या मुकाबला जैसे  भाव  हैं तो लाखों की सजावट भी बेकार है .
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ऐसे ही सबदों के चयन पर संगत के रुख देखे हैं .हम जानते हैं कि हम संगत हिन्दू ,सिख और बाकी सभी धर्मों के हैं ..बहुतों को पंजाबी नहीं आती .पर वो सबद , जो बार -बार बड़े मन्दिर या कहीं  और सुनने को मिलते हैं ,उनसे हम जुड़ जाते हैं ..संगत हो सकता है खुद बड़े ही गूढ़  अर्थों वाले सब्द सुनते हों ,पर यदि हम सत्संग कर रहे हैं, तो हमें संगत का ख्याल रखना है ,उन्हें जब थोडा बहुत सब्द  भी  समझ आएगा, तभी  तो ब्रह्म से जोड़ने में सफल होंगे  ,.नहीं तो हमें आलस्य या नींद सी आने लगती है .. छोटी –छोटी बातें हैं पर हम सेवादार हैं, तो हममें हमेशा ही सुधार की गुंजाईश रहती है
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  हम वो करें जो संगत को गुरूजी से  जोड़े ,,सत्संग का यही मकसद है ... भरोसा रखें ..हमारे हर पल पर  गुरूजी की निगाह है .हमसे गलत नहीं होने देंगे
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जय गुरूजी

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